रूहानी पाठ-5

Wednesday, April 12, 2006

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धन नही चाहिए प्रभु मुझे राज्य नही चाहिए।
केवल ये इच्छा है कि मै सन्तोषी हो जाऊँ।
लोगों के दु:ख दूर हो।
सबके की कल्याण कामना मेरे ह्रदय मे प्रस्फुटित होती रहे।

सन्तोषी व्यक्ति के समान कोई सुखी नही और असन्तोषी के समान कोई दुखी नही।
मन मे अगर सन्तोष है तो भले ही साधन, सुविधाए कम हो तो भी व्यक्ति प्रसन्न रहता है। परन्तु धन-सम्पदा पदार्थो की प्रचुरता होने पर भी अगर ह्रदय मे तृष्णा, इच्छाओ ने डेरा लगा रखा हो तो मनुष्य सदैव इच्छाओ की अग्नि में जलता रहता है।‘और मिले’-‘और मिले’ ये स्पृहा शान्त नही होती। शान्ति किसे मिलती है?

चाह गई चिन्ता मिटी, मनुआँ बेपरवाह।
जाकों कुछ न चाहिएँ, वोहिं शहनशाहँ।।

अत: हमे जो प्राप्त हैं, उन्ही साधनों मे सन्तोष धारण करके निरन्तर प्रभु की भक्ती में मग्न रहना चाहिएँ।

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